हम नेपालियों ने तीन प्रकार के राजतंत्रों का सामना किया है: २०१५ के संविधान के अनुसार राजतंत्र और पार्टी लोकतंत्र, २०१७ में महेंद्र द्वारा सैन्य बलपर लाई गई राजशाही को २०४६ तक जारी रखना, और २०४६ आंदोलन द्वारा स्थापित पार्टी लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत संवैधानिक राजतंत्र। पिछली दो राजशाहियों में कार्यकारी शक्ति राजा में निहित थी। विसं. २०४६ के जनांदोलन के बल पर अस्तित्व में आए संवैधानिक राजतंत्र/लोकतंत्र में कार्यकारी शक्तियां संसद में निहित थीं। जनता के प्रतिनिधि राज्य चला रहे थे। राजा को उनके द्वारा लिये गये निर्णयों को स्वीकृति देनी पड़ती थी। राजा के पास कोई विशेष अधिकार नहीं थे, सभी अधिकार छीन लिये गये थे। राजा संवैधानिक था।
लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना के बाद आम नागरिक देश को समृद्ध और सुशासन के जरिए आत्म सम्मान और सुरक्षित जीवनशैली को अनुभव करना चाहते थे। जो कि गणतांत्रिक राजनीतिक पार्टी की प्राथमिकता नहीं थी। संविधान निर्माण के तांडव, आर्थिक लूट खसोट और सांस्कृतिक आक्रमण को आम लोगों ने भीषण अनुभव किया। सत्ता के आड़ में शक्ति का दुरुपयोग और राज्य संसाधनों के नंगा दुरुपयोग भी दर्शन आम हो गया। सारे पत्र पत्रिकाएं, सामाजिक संजाल और विद्युतीय समाचार माध्यमों मे प्रमुख विषय के रूपमें पिछले १८ वर्षों से भ्रष्टाचार ही छाया रहा। आम जनता के इच्छा और भावना के विपरीत विदेशियों के डालरके लोभ में नेपाल को धर्म निरपेक्ष घोषित कर हिंदुओं को धर्म परिवर्तन के वैश्विक योजनाओं के तहत मजबूर होने को बाध्य करना ही इन नेताओ का मुख्य अजेंडा रहा। इसे हम नेपालियों के द्वारा नेपाली जनता और राष्ट्रीयता के साथ सामूहिक षडयन्त्र का नाम दे सकते हैं। वास्तव में इन १८ वर्षों में गणतांत्रिक नेताओं ने युवाओं को विदेश जाने को मजबूर करना, देशको नष्ट होनेतक लूटना, अपनी हिन्दू संस्कृति को नष्ट करने के लिए योजनाएं बनाना और आम नागरिक को आर्थिक, भौतिक तथा सामरिक रूपसे दीनहीन बनाने के लिए हर संभव प्रयास करना। अधिकार मांगने पर लाठी गोली वर्सना इनका आदर्श लोकतान्त्रिक गणतांत्रिक का तानाशाही संस्कार के विरुद्ध आज देशमें राजावादी आंदोलन जीवंत हो पाया है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के आने के वाद वर्तमान में ऐसा कोई वैश्विक वातावरण नहीं है जहां कोई बाहरी ताकतों को खुश करके भी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा किया जा सके। लेकिन भिखारी और नपुंसक विचार के लोगों के पास इतनी गंभीरता से सोचने का संस्कार ही कहाँ होता है। विदेशियों के दयापात्र बनकर सत्ता के लोभ में अपने ही देश, संस्कृति, धर्म और अस्तित्व को वेचनेवाली मानसिकता के विरुद्ध जनता का आक्रोशित होना स्वाभाविक है। दस वर्ष में एक पीढ़ी बदल जाता है। नेपाल जैसे छोटे देशों के संदर्भ में यह बहुत महत्व रखता है। पिछले २० वर्षों में लगभग एक करोड़ युवा का पदार्पण हो चुका है, जिन्हें न माओवादी आंदोलन का कुछ अनुभव है, न लोकतान्त्रिक प्रणाली और नाही किसी नेता और पार्टी के प्रति संवेदना ही है। इन युवाओं को वर्तमान राष्ट्रीय अवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, भौतिक विकास और सुनिश्चित भविष्य की गारंटी चाहिए, जो इन नेताओ से कदापि संभव नहीं दिखाई दे रहा था। विदेशों मे अपमान ,पीड़ा और कष्ट झेल रहे युवाओं के लिए विद्रोह के अलावा कोई अन्य मार्ग नहीं दिख रहा है, न किसी पार्टी और नेतृत्व में राष्ट्रीयता गंध ही मिल रहा है। अतः घोर निरासा के काले वादल को हटाने के लिए जो परंपरागत मार्ग दिखा वह था आंदोलन;
पिछले तीन-चार महीनों में विश्व राजनीति में गुणात्मक परिवर्तन आया है। विश्वभर बहुत उथल-पुथल मची हुई है। अब कोई भी एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का सामना नहीं कर सकता। विश्व बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। संप्रभुता का सम्मान हो तथा सभी देशों, बड़े और छोटे, पूर्व और पश्चिम, के हितों को बढ़ावा मिले। यह निश्चित रूप से सिर्फ सत्ता का आदान-प्रदान नहीं होगा, बल्कि अपने साथ न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था के मूल्य भी लाएगा। हमारे आसपास रणनीतिक परिवर्तन भी हुए हैं। हाल ही में भारत और चीन के बीच संबंधों में सुधार हुआ है। यह उनके बीच ६०-६५ वर्षों के बाद एक नया परिदृश्य है। भारत और चीन के बीच सुलह नेपाल के लिए एक सुखद घटना है।
नेपाली राजनीतिक हलकों में भी विदेशी संबंधों में शीत युद्ध युग की वैचारिक खामियां बरकरार हैं। लोगों की बढ़ती जागरूकता ने महत्वाकांक्षा और उपलब्धि, नारों और कार्यों के बीच अंतर करना शुरू कर दिया है। यह आम समझ है कि सभी के साथ, विशेषकर दो पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध, बाह्य संबंधों में गैर-वैचारिक और गुटनिरपेक्ष आधार पर बनाए जाने चाहिए। यह नेपाल की भौतिक स्थिति में भू-राजनीति का भी परिणाम है।
हमारी अपनी भू-राजनीतिक स्थिति है। विशेषकर हमारे दो पड़ोसी देश, चीन और भारत, जिनकी राजनीतिक व्यवस्थाएं, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्थाएं अलग-अलग हैं। हम इसके मध्य में हैं। ऐसी स्थिति में नेपाल को उनके साथ अपने संबंधों को विशेष तटस्थता और व्यावहारिकता को केंद्र मे रखकर एक अच्छे पड़ोसी के रूप में खुद को स्थापित करना चाहिए। नेपालका आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और दैनिक व्यावहारिक संबंधों के गूंज भारत के तुलना में अन्य देशों से शून्य प्रायः है; इसका मतलब है कि हमें स्वयं जिम्मेदार और समझदार होना होगा। अपनी समग्र सुरक्षा को देखते हुए पड़ोसियों के वैध हितों का सम्मान और भरोसा दिला पाना हमारी कूटनीतिक सफलता का प्रतीक माना जाएगा।
किसी भी सभ्य देश के लिए यह उचित नहीं है कि वह किसी अन्य देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करके अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास करे। राष्ट्रीय संप्रभुता, समानता और कानून के शासन के प्रति सम्मान अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के आदर्श हैं। छोटे राष्ट्रों की यह वैध अपेक्षा रहती है कि बड़े राष्ट्र उनका सम्मान करेंगे। लेकिन सत्ताधारी पार्टी के लोग यह भूल जाते हैं कि विपक्षी अगर लोकतान्त्रिक ढंग से विरोध प्रदर्शन कर रहा है तो उससे तत्काल वार्ता कि जाए। उसके जायज मागों को यथाशीघ्र पूर्ति कि जाए। परंतु नेपाल के संदर्भ में लोकतंत्र स्थापना के वाद पिछले ४४ वर्षों से हम सत्ताधारियों के द्वारा जनता के भावनाओं को सीधा लात मारते हुए देखते आ रहे हैं। इस स्थिति में नेपाल में लोकतंत्र है; यह कहना आत्मरति से जादा नहीं है।
ध्यान रहे, भारत और चीन के पास नेपाल जैसे दीनहिन देश के लिए सोचने का समय नहीं है। वो इस बात की वकालत नहीं करते हैं कि राजतंत्र सही है या दलीय प्रणाली सही है। इन बातों के लिए उनका कोई प्यादा ही काफी है, जिसका प्रमाण माओवादी को भारत मे संरक्षण, संपोषण और संवर्धन से प्राप्त होता है।
नेपाल में वर्तमान में जो उथल-पुथल चल रही है, वह मूलतः नेपाल का अपना आंतरिक मामला है। नेपाल और उसके राजनीतिक दलों को आंतरिक त्रुटियों को सुधारना होगा। पार्टी चलाने और सरकार चलाने की प्रक्रिया में सुधार होना चाहिए। नेताओं को सत्ता-उन्मुख होने के बजाय जन-उन्मुख और राष्ट्रोंन्मुख होना चाहिए। नेपाली जनता इन सब बातों को समझ चुकी है। आज के नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता अज्ञानी नहीं है, वह न केवल खाड़ी देशों में पसीना बहा रहे हैं, बल्कि वे विकसित देशों के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। वे वहां के विकास और व्यवस्था का अवलोकन करने के बाद नेपाल लौट आये हैं। लोगों का मानना है कि जो उन्होंने वहां देखा, वैसा नेपाल में भी किया जा सकता है, लेकिन वैसा माहौल न देख पाने के कारण भी उनमें गुस्सा है। वे सुशासन की नींव को कमजोर होते तथा राष्ट्रीय अखंडता को तयार तयार होते देखकर आक्रोशित हो चुके हैं। भ्रष्टाचार के लिए संरचनात्मक और अंतर-पार्टी प्रणाली में देखे गए वैचारिक दिवालिया, अयोग्यता तथा धोखेपन के पहाड़ को देख नेताओं के प्रति घृणा रूपी सागर में महाविनाश के तूफान उठने लगे है। यह आंदोलन इसी का प्रमाण है।