"धर्म सर्वोपरि है" यह एक सार्वभौमिक सत्य है। जहाँ धर्म है वहाँ एक राष्ट्र है जहां धर्म नहीं है वहाँ कोई राष्ट्र नहीं होता। यदि होता है तो सिर्फ धोखा, कलह, अनेकों वाद-परिवाद (जातिवाद, सम्प्रदायवाद, नक्सलवाद आदि) अत्याचार, अपराध, पाखंड, दंगे, फसाद और युद्ध।

   राष्ट्र की पहचान है सामाजिक एकता, सामाजिक समरसता, समान शैक्षणिक, समान आर्थिक, समान सामाजिक व समान मानवीय मूल्यों की मजबूत स्थिति। जो बिना धर्म के अनुपालन के किसी भी प्रकार संभव नही है।

    अब बात करते है उस राष्ट्र की जिसके पक्षधर वह लोग है जिनके लिये धर्म का राष्ट्रीय स्तर पर होना अनिवार्य नहीं है इसका सीधा अर्थ है कि वह नहीं चाहते कि समाज में एकता हो, समरसता हो, समान शिक्षा हो, समान सामाजिक अधिकार हों। वह सब प्रकार से उन कारणों को आविष्कृत  कर लेगें जो समाज को नष्ट-भ्रष्ट करने में सक्षम हों। इन लोंगों का राष्ट्रवादी प्रेम मात्र एक दिखावे से अधिक कुछ भी नहीं होता। सदां दुखपूर्ण स्थितियों को बनाये रखना व घड़याली आँसू बहाते रहना, अपने छदम् स्वार्थों की पूर्ति करते रहना ही उनका एक मात्र लक्ष्य होता है।

    यदि राष्ट्र आगे है और धर्म पीछे है तो अर्थ सीधा है कि कोई ओर छिपा हुआ सम्प्रदाय चोरी-चोरी पैर पसार रहा है। मुख्य राष्ट्र को चोर संप्रदाय निगल रहा है। 

     अत: स्पष्ट है कि राष्ट्र की रक्षा धर्म की रक्षा से होती है न कि इंकलाब-जिन्दाबाद के नारों से। यदि राष्ट्र रक्षा करना चाहतें हैं तो धर्म की रक्षा करो। धर्म की रक्षा से तात्पर्य मूलभूत धर्मग्रंथ (पवित्र वेद) की रक्षा से अर्थात् पढ़ने पढ़ाने प्रसार प्रचार व सम्प्रदायिक लोंगों को मुख्य धर्म में दिक्षित करने से ही संभव है।वेद किसी संप्रदाय विशेष का नहीं है धरती पर सभी मानवों का ईश्वर का ज्ञान है। 

       अत: स्पष्ट है राष्ट्र सर्वोपरी नहीं है। राष्ट्र मात्र एक virtual state है जहां लोगों को एकमत करने के लिये हम सुगमतापूर्वक धर्मवृद्धी का कार्य कर सकते है अर्थात् वह स्थान हमारे लिये हमारा राष्ट्र नहीं है जहां हम अपने धर्म को सुरक्षित व प्रसारित नहीं कर सकते हैं।

            धर्म ही महान है। धर्म ही सर्वोत्तम है। बिना धर्म के राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती। बिना धर्म के किसी राष्ट्र का अस्तित्व ही नहीं होता। कोई भी राष्ट्र बिना धर्म के जीवित नहीं रह सकता। राष्ट्र तो बनते बिगड़ते रहते है पर राष्ट्रों का निर्माण धर्म ही करता है। धर्म राष्ट्र की धुरी है, राष्ट्र की आत्मा है, प्राण है। बिना धर्म के राष्ट्र मृत प्राय है।

     उदाहरण हमारे सामने है - भारत कभी ईरान तक था आर्यावर्त भी कभी विस्तृत भूभाग तक था ईरान से इंडोनेशिया और मॉरिशस से मास्को तक आर्यावर्त था पर धर्म सिकुड़ता गया राष्ट्र बंटता गया। जहाँ धर्म रहा वो भाग आज भारत का भाग है। जहाँ धर्म लुप्त जैसे कश्मीर व् पूर्वोत्तर भारत, उस भाग के भारत से अलग होने के षड्यंत्र चलते रहते है। यानी धर्म व् संस्कृति के कारण भारत का अस्तित्व है।

         अब दूसरा उदाहरण देखें -

यहूदियो का राज्य था इजराइल जहाँ से उन्हें ईसाइयों ने मार कर भगा दिया। रोमनों ने भी उन पर अत्याचार किये। फिर इस्लाम आया और उसने भी यहूदियो पर अत्याचार किये पर उन्होंने सब कुछ खोकर केवल धर्म बचाये रखा। यहूदियों ने धर्म की रक्षा करके स्वयं को बचाये रखा और इजराइल की स्थापना की। उनका धर्म न बचता तो राष्ट्र भी न बचता। इसलिए धर्म सर्वोपरी है। धर्म ही राष्ट्र का निर्माण करता है न की राष्ट्र धर्म का। सनातन धर्म तब तक है जब तक यह भारत वैदिक ज्ञान के प्रकाश में लीन रहने वाला राष्ट्र रहेगा। ये राष्ट्र किसी राजा सम्राट के नाम से नहीं बल्कि ऋषियो मुनियो द्वारा पालित पोषित वेदिक ज्ञान में लीन रहने वाले देश के स्वभाविक नाम पर रखा गया है।

  धर्म सर्वोपरि है न की राष्ट्।

राष्ट्रभक्त नहीं धर्मभक्त बने।

जिसका जैसा धर्म उसका वैसा राष्ट्र॥

               अब बेहतर समझें कि जो मनुष्य राष्ट्र की बात करता है। उसकी रक्षा की बात करता है,परन्तु धर्म व उसकी रक्षा की बात नहीं करता, धर्म क्या है? नहीं जानता। वह मनुष्य अनाड़ी है वे समूह मूर्खों का समूह है।